सिक्के के दो पहलू

 

एक स्लीपर कोच, एक कलाई घड़ी और हमारे भविष्य से जुड़ा एक सवाल


उस युवक ने अभी-अभी एक कलाई पर बाँधने वाली  डिजिटल घड़ी खरीदी थी।

वह कोई महंगी घड़ी नहीं थी। सच तो यह है कि हममें से कई लोग एक कप कॉफी पर उससे अधिक खर्च कर देते हैं। लेकिन उसके चेहरे पर जो गर्व था, वह अनमोल था। उसने घड़ी को अपने दोस्तों को ऐसे दिखाया मानो कोई खज़ाना हासिल कर लिया हो। उसके साथी उसे देखकर मुस्कुराए, हँसे, और कुछ क्षणों के लिए भीड़ से भरा वह रेलवे डिब्बा जैसे रोशन हो उठा।


मुंबई पीछे छूट गया था, लेकिन वह दृश्य मेरे मन में लंबे समय तक बना रहा।


हाल ही में मैंने मुंबई से लौटते समय पुष्पक एक्सप्रेस के स्लीपर कोच में यात्रा करने का निर्णय लिया। वर्षों बाद यह सफ़र कर रहा था। यही वह श्रेणी थी जिसमें कभी मैं नौकरी की तलाश के दिनों में सफ़र किया करता था। मौसम बेहद गर्म और उमस भरा था, डिब्बा खचाखच भरा हुआ था और आराम जैसी कोई चीज़ वहाँ मौजूद नहीं थी। फिर भी उन कुछ घंटों में जो अनुभव मिला, वह किसी भी वातानुकूलित यात्रा से कहीं अधिक मूल्यवान था।


पूरा डिब्बा युवा कामगारों से भरा हुआ थानिर्माण मजदूर, ड्राइवर, सुरक्षा गार्ड और न जाने किस तरह के कामगार और कर्मचारी । अधिकांश की उम्र पंद्रह से पच्चीस वर्ष के बीच रही होगी। वे महीनों की कठिन मेहनत के बाद अपने घर लौट रहे थे। उनके चमकदार सूटकेस और बैग में परिवार के लिए उपहार थे, जेबों में कमाई में से बचत की रकम थी और चेहरों पर घर पहुँचने की खुशी।


कुछ अपने स्मार्टफोन पर रील्स देख रहे थे। कुछ परिवार की योजनाओं पर चर्चा कर रहे थे। कुछ यह हिसाब लगा रहे थे कि घर पहुँचकर माता-पिता को कितने पैसे देंगे।


मुझे उनकी वस्तुओं  जैसे मोबाइल, चैन और घडी ने प्रभावित नहीं किया।


मुझे प्रभावित किया उनकी आभा ने।

आत्मविश्वास।

उद्देश्य।

दिशा का बोध।

और आगे बढ़ते रहने का विश्वास।


गर्म दोपहर में ट्रेन अपनी गति से आगे बढ़ रही थी और मेरे दिमाग में उन युवाओं की तस्वीरें आने लगी जिनसे मैं अक्सर अपने कार्यशालाओं में मिलता हूँइंजीनियरिंग और मैनेजमेंट के छात्र।


वे मुझसे कठिन प्रश्न पूछते हैं।

क्या AI हमारी नौकरियाँ छीन लेगा?”

क्या मेरी डिग्री पर्याप्त है?”

मुझे कौन-सा कौशल सीखना चाहिए?”

अगर मैं असफल हो गया तो?”

इन सभी प्रश्नों के पीछे एक ही भावना छिपी होती हैअनिश्चितता।


आज का युवा एक ऐसी दुनिया का सामना कर रहा है जो अभूतपूर्व गति से बदल रही है। तकनीकें विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों से भी तेज़ी से विकसित हो रही हैं। उद्योग ऐसे कौशल मांग रहे हैं जिन्हें कक्षाएँ अभी तक सिखा नहीं पा रही हैं। हर दिन एक नया टूल, एक नया प्लेटफॉर्म और एक नया बदलाव सामने आ रहा है।


कई शिक्षित युवा इस डर के साथ जी रहे हैं कि कहीं वे अप्रासंगिक न हो जाएँ।


और दूसरी ओर थे वे स्लीपर कोच के कामगार।


उन्हें शायद आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के बारे में बहुत कम जानकारी थी।

संभव है उन्होंने कभी जेनरेटिव AI”, “प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंगया एजेंटिक वर्कफ़्लोजैसे शब्द भी न सुने हों।

फिर भी उनके पास एक ऐसी संपत्ति थी जिसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती।


वे हर दिन सीख रहे थे।


किताबों से नहीं,

ज़िंदगी से।

हर नया  निर्माण स्थल उन्हें दक्षता सिखा रहा था।

हर सड़क की नई राहे उन्हें जिम्मेदारी सिखा रही थी।

हर रात की ड्यूटी उन्हें अनुशासन सिखा रही थी।

हर चुनौती उनकी संघर्ष करने की क्षमता को और मजबूत बना रही थी।

वे अवसरों की प्रतीक्षा नहीं कर रहे थे।

वे स्वयं अवसर बना रहे थे।

वे भविष्य पर बहस नहीं कर रहे थे।

वे अपने हाथों से उसे गढ़ रहे थे।


और तभी मुझे एहसास हुआ कि शिक्षा और जीवन-बुद्धि (विजडम) हमेशा साथ-साथ नहीं चलतीं।

एक समूह के पास डिग्रियाँ हैं, लेकिन आत्मविश्वास की कमी है।

दूसरे समूह के पास आत्मविश्वास है, लेकिन व्यवस्थित विकास के अवसर कम हैं।

दोनों अधूरे हैं।

छात्र इन कामगारों से धैर्य, अनुकूलनशीलता और साहस सीख सकते हैं।

और ये कामगार शिक्षा, तकनीक तथा संरचित ज्ञान से अपने जीवन को नई दिशा दे सकते हैं।

एक समूह भविष्य को समझता है।

दूसरा जीवन के संघर्षों को।


ज़रा कल्पना कीजिए कि यदि ये दोनों संसार आधे रास्ते पर मिल जाएँ तो क्या हो सकता है।


शाम ढलने लगी थी। ट्रेन धीरे-धीरे घर की ओर बढ़ रही थी। मैं एक सरल लेकिन गहरी सच्चाई के बारे में सोच रहा था।


जीवन केवल जानने वालों को शायद ही कभी पुरस्कृत करता है।



जीवन उन लोगों को पुरस्कृत करता है जो करके दिखाते हैं।


शायद हमारे समाज की वास्तविक खाई शिक्षित और अशिक्षित, शहर और गाँव, या डिजिटल और मैनुअल कामगारों के बीच नहीं है।

शायद यह खाई उन लोगों के बीच है जो प्रतीक्षा करते रहते हैं और उन लोगों के बीच है जो कदम बढ़ाते हैं।

और यही विचार हमें एक ऐसे प्रश्न  से रूबरू कर देता है, जिसे हर विद्यार्थी, हर पेशेवर, हर उद्यमी और हर कामगार को स्वयं से पूछना चाहिए

क्या मैं अपना जीवन भविष्य की चिंता करने में बिता रहा हूँ, या फिर उस भविष्य को बनाने के लिए आवश्यक कौशल, साहस और चरित्र का निर्माण कर रहा हूँ?


Comments

Popular posts from this blog

Love That Spoke in Silence

Dr Vartika Nanda, Media Personality and Social worker gets first Rajkumar Keswani Memorial Award

मन के जीते जीत