बेजुबान
बेजुबान सुबह की कुनकुनी धूप खिल गई थी । मैं भी 19 वें माले पर चाय की प्याली लेकर अपने नियत स्थान पर गैलरी के किनारे अखबार पढ़ते हुए बैठा था । अख़बार कोरोना वायरस और उससे जुड़ी खबरों से पटा पड़ा था । कभी-कभी ये अख़बार भी नीरस और डरावने लगते हैं । शब्दों और आंकड़ों के मायाजाल से दिल बैठने लगता है । ख़ैर मेरी नजर तो गैलरी पर टिकी हुई थी । एक कबूतर का जोड़ा रेलिंग पर बैठा वार्तालाप कर रहा था । पिछले कुछ दिनों से मैं उनकी आवाज समझने लगा था । एक दोस्त ने बताया था कि जिस कबूतर की गर्दन मोटी होती है वह नर कबूतर होता है । उसकी चोंच भी छोटी होती है । पतली गर्दन मादा कबूतर की होती है । तो ठीक है , आगे की कहानी में नर कबूतर को मैं कबूतर और मादा को कबूरतरनी ही कहूंगा। आज कबूतर बड़े ही सीरियस मूड में था । कबूतरनी ने अपनी आंखें गोल-गोल घुमाते हुए पूछा : "नाराज लग रहे हो ?" कबूतर : "नाराज न हूँ तो क्या ? कल उस बी ब्लॉक की छठी मंजिल पर रहने वाली डॉक्टर से पड़ोसियों ने क्या बदतमीजी की और कैसी - कैसी भद्दी गालियां दी थी ।...