सिक्के के दो पहलू
एक स्लीपर कोच , एक कलाई घड़ी और हमारे भविष्य से जुड़ा एक सवाल उस युवक ने अभी-अभी एक कलाई पर बाँधने वाली डिजिटल घड़ी खरीदी थी। वह कोई महंगी घड़ी नहीं थी। सच तो यह है कि हममें से कई लोग एक कप कॉफी पर उससे अधिक खर्च कर देते हैं। लेकिन उसके चेहरे पर जो गर्व था , वह अनमोल था। उसने घड़ी को अपने दोस्तों को ऐसे दिखाया मानो कोई खज़ाना हासिल कर लिया हो। उसके साथी उसे देखकर मुस्कुराए , हँसे , और कुछ क्षणों के लिए भीड़ से भरा वह रेलवे डिब्बा जैसे रोशन हो उठा। मुंबई पीछे छूट गया था , लेकिन वह दृश्य मेरे मन में लंबे समय तक बना रहा। हाल ही में मैंने मुंबई से लौटते समय पुष्पक एक्सप्रेस के स्लीपर कोच में यात्रा करने का निर्णय लिया। वर्षों बाद यह सफ़र कर रहा था। यही वह श्रेणी थी जिसमें कभी मैं नौकरी की तलाश के दिनों में सफ़र किया करता था। मौसम बेहद गर्म और उमस भरा था , डिब्बा खचाखच भरा हुआ था और आराम जैसी कोई चीज़ वहाँ मौजूद नहीं थी। फिर भी उन कुछ घंटों में जो अनुभव मिला , वह किसी भी वातानुकूलित यात्रा से कहीं अधिक मूल्यवान था। पूरा डिब्बा युवा कामगारों से भरा हुआ था — निर्माण मजदूर...